“होरी हो ब्रजराज” की लय-ताल पर थिरक उठे भोपालवासी

DR. SUMIT SENDRAM

भोपाल। आसमान से उतरती फागुनी शाम जब रंगों की पुरखुश सौगाते समेटी तो मन का मौसम भी खिल उठा।
रवींद्र भवन के खुले मंच पर ”होरी हो ब्रजराज” ने ऐसा ही समां बांधा।
मुरली की तान उठी, ढोलक, मृदंग और ढप पर ताल छिड़ी, होरी के गीत गूँजे और नृत्य की अलमस्ती में हुरियारों के पांव थिरके।
रंगपंचमी की पूर्वसंध्या पर लोकरंगों की गागर छलकी तो शहर के रसिकों का रेला भी उसकी आगोश में उमड़ आया।
टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय और पुरू कथक अकादमी की साझा पहल पर प्रेम, सद्भाव और अमन की आरजूओं का यह अनूठा पैगाम था।
कथक नृत्यांगना क्षमा मालवीय के निर्देशन में 50 से भी ज्यादा कलाकारों ने मिलकर ”होरी हो ब्रजराज” को अंजाम दिया।
कवि-कथाकार संतोष चौबे की परिकल्पना से तैयार हुयी लगभग डेढ़ घंटे की इस प्रस्तुति में ब्रज और मैनपुरी के 13 पारंपरिक होली गीतों को शामिल किया गया। इन गीतों के साथ जुड़े प्रसंगों और संगीत-नृत्य के पहलुओं को कला समीक्षक और उद्घोषक विनय उपाध्याय ने बखूबी पेश किया।
प्रकाश परिकल्पना का सुंदर संयोजन वरिष्ठ रंगकर्मी अनूप जोशी बंटी ने किया।
संगीत समन्वय और गायन समूह में संतोष कौशिक, राजू राव, कैलाश यादव, उमा कोरवार, आनंद भट्टाचार्य, वीरेंद्र कोरे आदि कलाकारों की भागीदारी रही।

 

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