वॉटर पार्क में खूनी संघर्ष, हाईवे के रिसोर्ट पर पूल पार्टी में महिलाओं से छेड़छाड़ का मामला

DR. SUMIT SENDRAM

भोपाल। राजधानी भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में वॉटर पार्क और पूल पार्टी कल्चर अब तेजी से बढ़ रहा है।
लेकिन, अब यही कल्चर परिवारों के लिए मनोरंजन के बजाय असुरक्षा का सबब बन रहे हैं। खासतौर पर नर्मदापुरम रोड और इंदौर हाईवे पर संचालित किए जाने वाले ये मनोरंजन केंद्र सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर संचालित किए जा रहे हैं।
रविवार को भी शहर के एक प्रमुख वाटर पार्क में हुई एक घटना ने इन स्थानों पर सुरक्षा, खास तौर पर महिला सुरक्षा के दावों की पोल खोलकर रख दी है।
दरअसल महंगी चकाचौंध वाले इन स्थानों पर परिवार एंजॉयमेंट के लिए पहुंचते हैं, लेकिन जब उनके साथ अभद्र व्यवहार होता है तो मदद करने कोई नहीं आता।
रविवार को वीकेंड पार्टी आयोजन स्थल वाटर पार्क में भोपाल से गए संभ्रांत परिवारों की महिलाओं और युवतियों के साथ अलग-अलग टोली में आए युवकों की भीड़ ने अभद्र व्यवहार और छेड़छाड़ शुरू कर दी।
इस घटना ने ऐसे स्थलों पर महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
वीकेंड सेलिब्रेशन के लिए भोपाल से पहुंचे कुछ परिवारों की महिलाओं के साथ बेखौफ मनचलों ने छेड़छाड़ शुरू कर दी। युवकों के इस अभद्र व्यवहार का विरोध करने पर दोनों पक्षों में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। बीच-बचाव करने की बजाय वाटर पार्क मैनेजमेंट ने भी ग्रामीण क्षेत्र के तथाकथित सुरक्षा गार्डों को बुलाया और झगड़ा खत्म करवाने की बजाय जमकर मारपीट शुरू करवा दी।
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। बावजूद इसके पुलिस प्रशासन ने अब तक इस मामले में कोई संज्ञान नहीं लिया है।
गौरतलब है कि इसी वाटर पार्क में दो साल पहले रविवार के ही दिन 9 साल के बच्चे की डूबने से मौत हो गई थी। भोपाल के रहने वाले गौरव राजपूत का परिवार आज भी इस हादसे सदमे में है। वे, पत्नी अर्चना, 9 साल के बेटे आरुष, 2 साल के बेटे आरव और भाभी के साथ वाटर पार्क गए थे। लेकिन सुरक्षा इंतजामों की नाकाफी इनकी खुशियों पर भारी पड़ गई।
गंभीर मामला यह है कि इंदौर-नर्मदापुरम हाईवे के किनारे स्थित कई कृषि भूमियों पर बिना किसी वैध व्यावसायिक अनुमति के पूल पार्टी कैंपस डेवलप किए जा रहे हैं।
कम बजट में प्राइवेट पार्टी का लालच ग्राहकों को आकर्षित करता है। लेकिन कम बजट के ये पैकेज ऐसे रिसोर्ट्स के कारण भारी पड़ जाते हैं, जब न तो आने वालों का कोई रिकॉर्ड रखा जाता है और न ही सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम किए जाता हैं।
ग्रामीणों को गार्ड की वर्दी पहनाकर तैयार करना मैनेजमेंट की ऐसी रणनीति है जो विवाद की स्थिति में पुलिस का साथ देने के बजाय स्थानीय दबाव में आकर काम करती है।
यह घटना कोई छोटी-बड़ी घटना नहीं है, बल्कि वीडियो साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद, स्थानीय पुलिस प्रशासन का चुप बैठना हैरान करने वाला है। अब तक किसी तरह का एक्शन न होना ऐसे अवैध और असुरक्षित रिसोर्ट के मालिकों के हौंसले बुलंद करता दिख रहा है। सवाल अब यह भी है कि अगर कोई बड़ी जनहानि होती या गंभीर हादसा होता तो भी क्या पुलिस प्रशासन ऐसे ही मौन रहता?
क्या ऐसे मामलों में कोई जवाबदेही तय नहीं होनी चाहिए या फिर प्रशासन को वाकई किसी बड़े हादसे या अनहोनी का इंतजार है?

 

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