सीधी की गलियों में नशे की होली खेलने 24 घंटे सुलग रहीं कच्ची शराब की भट्टियाँ, शहर से लेकर गाँव तक बेखौफ बना रहे मौत की दवा

सीधी। जिले के अन्तर्गत कच्ची शराब जिले के नौजवानों से लेकर बुजुर्गों को खोखला करती जा रही है। इस जहरीली शराब को बनाने का काम भट्टियों में किया जा रहा है। ये भट्टिटयाँ सिर्फ पुलिसिया कार्रवाई तक बंद रहती हैं, इसके बाद फिर से चालू हो जाती हैं। शराब बनने के बाद कच्ची शराब के ठीहे आबाद हो जाते हैं। इस तरह कच्ची शराब के माफिया अपने मंसूबों को अंजाम दे रहे हैं और पुलिस व आबकारी इस तरफ ध्यान ही नहीं दे रही है। कार्रवाई के नाम पर महज दो-चार कुप्पी कच्ची शराब पकड़ी जा रही है, जबकि कच्ची शराब के अड्‌डे और भट्टियों को ध्वस्त करने की कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
कच्ची शराब बनाने का काम शहर से लेकर गाँव तक बड़ी तेजी से किया जा रहा है। यह शराब शहर और गाँव में उन्हीं अड्‌डों पर बनाई और बेची जा रही है, जहाँ पहले पुलिस कार्रवाई कर चुकी है।
जिले में कच्ची शराब के लिए कुख्यात हो चुके इलाकों में तो थानों की पुलिस देखकर भी अनजान बनी हुई है, और नजराने की दम पर काम चल रहा है। इसमें पुलिस पेट्रोलिंग टीम और बीट वालों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे अवैध काम को बंद करवाए, लेकिन वो भी इस तरफ ध्यान नहीं दे रहे हैं।
प्रदेश में जब कभी जहरीली शराब पीने से मौत होती है, उसके बाद कुछ दिनों तक प्रदेश स्तर पर अभियान चलाया जाता है। कुछ कुख्यात कच्ची शराब के अड्‌डों को ध्वस्त भी किया जाता है। समय बीतते ही फिर से नए अड्डे तैयार हो जाते हैं। कच्ची शराब माफिया का खेल पुलिस और आबकारी को भी मालूम है, लेकिन चंद दिनों तक छोटी-मोटी कार्रवाई करके जब्ती दिखा दी जाती है, इसके बाद फिर से अड्‌डों पर शराब बिकना शुरू हो जाती है। जिले में आज भी गरीब मजदूर वर्ग के लोग कच्ची शराब के ठिकानों पर सुबह शाम दिखाई पड़ जाते हैं। लॉकडाउन में भी यह अड्डे संचालित रहे थे और अनलॉक के बाद यह कारोबार दोगुनी गति से संचालित हो रहा है।
कच्ची शराब मानव स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा असर डालती है। कई लोग अकाल मौत मर चुके हैं, लेकिन बताया जाता है कि यह शराब भट्टियों में गुड़-शीर आदि से मिलाकर बनाई जाती है। ज्यादा नशे के लिए घातक तत्व मिलाए जाते है, जो जानलेवा साबित होते हैं।
कच्ची शराब को बनाने में सड़ा- गला गुड़, शीरा, नौसादर, यूरिया, धतूरे के बीज, ऑक्सीटोसिन इंजेक्शन और यीस्ट के साथ स्प्रिंट को आपस में मिलाया जाता है। जब ग्राहक नशा कम होने की बात करते हैं तब मिश्रण में कुछ तत्वों जैसे नौसादर, धतूरे के बीज और ऑक्सीटोसिन की मात्रा बढ़ा दी जाती है। जब तक ये तत्व एक निश्चित मात्रा में रहते हैं नशा बढ़ता है, लेकिन कई बार कोई तत्व ज्यादा हो जाता है, तो शराब जहरीली हो जाती है। इसके सेवन से जान जाती है।
बताया जाता है कि ऑक्सीटोसिन जैसे केमिकल मिलाने की वजह से शराब में मिथाइल एल्कोहल की मात्रा आ जाती है। मिथाइल एल्कोहल शरीर में जाते ही शरीर के अन्य रसायनों से मिलकर रिएक्शन करने लगता है। इससे शरीर के अंदरूनी अंग काम करना बंद कर देते हैं। इसकी वजह से आदमी की कई बार तुरंत मौत हो जाती है। कई बार यह स्लो-पॉइजन की तरह भी काम करता है।
जिले से लेकर गाँव तक कच्ची शराब कई घर के चिराग को बुझा चुकी है। कई परिवार यतीम हो चुके हैं। बच्चे और परिवार तबाह हो चुके हैं। इसके बावजूद कच्ची शराब का कारोबार थमने का नाम नहीं ले रहा है। जब कहीं जहरीली शराब से मौत होने की बात सामने आती है तो निर्देशों के बाद संबंधित विभाग जिलों में कच्ची शराब बरामद करते हैं। छापा मारते हैं। गिरफ्तारियां करते हैं, लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसे आरोपी कुछ दिन की जेल के बाद छूट जाते हैं।
धंधे में लिप्त रहे एक व्यक्ति से बात की तो चौंकाने वाली जानकारी मिली। उसका कहना था कि अब महुआ से शराब बनाने के दिन लद गए। अब सीधे केमिकल और नशे की गोलियों से शराब बनाई जा रही है। शराब बनाने वाले देशी शराब की एक कैरेट ले लेते हैं। जिसमें 50 पौये रहते हैं। यह शराब एक साथ निकालकर इसमें नेटावेट टेबलेट, एविल टेबलेट, गर्भ निरोधक माला-डी गोली, यूरिया और चायपत्ती का पानी मिला दिया जाता है। इससे शराब तीन गुना नशीली हो जाती है। इसका असर देशी शराब से ज्यादा होता है।

 

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