एम्स भोपाल कैंसर मरीजो के लिए बना रहा थ्रीडी ट्यूमर, कैंसर से मिलेगी निजात

भोपाल। इंडियन काउंसलिंग ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के मुताबिक महिलाओं में कैंसर के कुल मामलों में से सबसे अधिक 33.9% स्तन कैंसर के हैं। वही, 12.1% मामले सर्वाइकल कैंसर और 7.9% अंडाशय कैंसर के हैं।
इसी को देखते हुए एम्स भोपाल में एक नई तकनीक प्रारम्भ की जा रही है। इसको “थ्रीडी बायोप्रिंटेड” नाम दिया गया है।
इसमें खासतौर स्तन कैंसर जैसी बीमारियों से जूझ रहे मरीजों का उपचार किया जाएगा। इसकी मदद से कैंसर ग्रसित हिस्से का थ्रीडी मॉडल तैयार किया जा सकेगा, फिर वर्चुअल उपचार करके उसे नष्ट करने का प्रभावी तरीका जाना जाएगा, वही तरीका रोगी पर उपयोग किया जाएगा जिससे सटीक परिणाम मिल सके।
एम्स भोपाल के ट्रांसलेशनल मेडिसिन विभाग की डॉ. नेहा आर्य ने बताया कि स्तन कैंसर के लिए प्रयोगशाला बनाई गई है, जिसमें थ्रीडी बायोप्रिंटेड की मदद से ब्रेस्ट कैंसर के मरीजों के ह्यूमन सेल्स से थ्रीडी ट्यूमर बनाए जाएंगे, जो शरीर में होने वाले ट्यूमर जैसा ही होगा। उसकी कोशिकाएं भी उसी तरह की होंगी, इस थ्रीडी ट्यूमर पर दवाइयों का परीक्षण किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि देखा जाता है कि यदि स्तन कैंसर के 10 मरीजों को एक तरह का कैंसर पाया जाता है, लेकिन इन सभी पर दवाइयां एक समान प्रभावी नहीं होती। प्रत्येक रोगी का शरीर अलग तरीके से प्रतिक्रिया करता है। इसके निदान के लिए प्रत्येक व्यक्ति पर अलग-अलग दवाएं, उसकी मात्रा तय करने की तकनीक लाई गई है। इसके तहत स्तन कैंसर या अन्य कैंसर के मरीज के ट्यूमर से सेंपल लिया जाएगा। उसे लैब में ले जाकर थ्री बायोप्रिंटेड मशीन की मदद से थ्रीडी ट्यूमर बनाया जाएगा। थ्रीडी ट्यूमर बनने के बाद दवाओं का परीक्षण किया जाएगा। इससे जान सकेंगे कि उक्त मरीज के ट्यूमर में कौन सी दवा कारगर है और उसका आसानी से उपचार किया जाएगा।
इस थ्रीडी बायोप्रिंटिंग मशीन का कई प्रकार से उपयोग किया जा सकेगा। इससे मानव शरीर के आर्टिफिशियल टिशू (ऊतक) बनाए जाएंगे, जिसे टिशू इंजीनियरिंग कहा जाता है। एक प्रकार से सेल्स (कोशिकाएं) जब साथ में मिलते हैं, वह टिशू बनाते हैं। टिशू से मिलकर आर्गन बनाए जाते हैं। अभी फिलहाल लैंब में टिशू बनाए जा रहे हैं। इस मशीन की मदद से मरीज के कैंसर ग्रस्त त्वचा की नकली स्किन भी बनाई जा सकेगी, जो मरीज में लगाई जा सकेगी। इसमें मरीज के सेल्स का ही इस्तेमाल किया जाएगा। अभी तक इसके लिए सूकर की त्वचा का इस्तेमाल किया जाता है।
बता दे कि एम्स भोपाल को भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा स्थापित जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद से लगभग एक करोड़ रुपये का अनुदान मिला है। यह अनुदान दवा परीक्षण और व्यक्तिगत चिकित्सा के लिए प्रयोगशाला में विकसित 3-डी बायोप्रिंटेड स्तन कैंसर मॉडल विकसित करने दिया गया है। यहां यह शोध राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान राउरकेला के सहयोग से किया जा रहा है।
एम्स भोपाल के कार्यपालक निदेशक डॉ. अजय सिंह के मुताबिक एम्स भोपाल में थ्रीडी बायोप्रिंटेड मशीन लाई गई। जिसकी मदद से स्तन कैंसर व अन्य कैंसर का उपचार किया जा सकेेगा। जिससे मरीजों को बेवजह दवा खानी नहीं पड़ेगी। पशु परीक्षण पर निर्भरता कम होगी।

 

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