विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त कराने को फिर न्यायालय पहुंची कांग्रेस, विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जबलपुर हाईकोर्ट में लगाई याचिका

DR. SUMIT SENDRAM

जबलपुर। सागर जिले के बीना विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीती निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करवाने के लिए कांग्रेस विधायक दल ने फिर न्यायालय के ओर रुख किया है। दल-बदल कानून के तहत इसे जबलपुर हाईकोर्ट जबलपुर में चुनौती दी गई है।
बता दे कि विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सप्रे के भाजपा में जाने की घोषणा और पार्टी विरोधी गतिविधियों में संलग्न होने को आधार बनाकर मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका लगाई थी, जिसमें विधानसभा अध्यक्ष द्वारा दल-बदल कानून के अंतर्गत कार्रवाई नहीं करने को आधार बनाया गया था।
विधानसभा सचिवालय ने क्षेत्राधिकार के निर्धारण का मामला उठा दिया, जिस पर इंदौर खंडपीठ के क्षेत्राधिकार में मामला नहीं आने को आधार बनाकर याचिका खारिज कर दी।
निर्मला सप्रे की पार्टी विरोधी गतिविधियों के आधार पर विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई करने का आवेदन दिया था।
नियमानुसार 90 दिन में इसका निराकरण होना चाहिए, लेकिन मामला खिंचता गया तो फिर उमंग सिंघार ने हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में याचिका दायर करके निर्देश देने का अनुरोध किया था। विधानसभा सचिवालय ने क्षेत्राधिकार का मामला उठाते हुए पहले इसका निर्धारण करने का अनुरोध किया।
हाईकोर्ट ने अब यह निर्धारित कर दिया कि यह मामला उनके क्षेत्राधिकार में नहीं आता है। सचिवालय के अधिकारियों का कहना है कि निर्मला सप्रे सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से विधायक हैं, जो हाई कोर्ट जबलपुर के क्षेत्राधिकार में आता है।
न्यायालय के निर्णय पर अब विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने जबलपुर हाईकोर्ट में याचिका दायर की है।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि निर्मला सप्रे ने दल-बदल किया है। वह भाजपा की बैठकों में आ-जा रही हैं, जिसके प्रमाण उपलब्ध हैं। अब इसे लंबा खींचने की आवश्यकता नहीं है। दल-बदल कानून के तहत उनकी सदस्यता समाप्त कर छह वर्ष तक चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जानी चाहिए पर भाजपा उन्हें बचा रही है, क्योंकि इसके पहले रामनिवास रावत का इस्तीफा कराकर उन्हें उपचुनाव लड़ाया था, जिसमें वह हार गए। पार्टी इससे डरी हुई है, इसलिए कानूनी प्रक्रिया में प्रकरण को उलझाकर रखना चाहिए।

 

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