हाथियों की दंगल, पांच बार तोप की सलामी के साथ इंदौर में रंगपंचमी तक रहता था होली का उल्लास

इंदौर। होली उमंग और उल्लास का त्योहार है। इंदौर हर त्योहार धूम-धाम से मनाया जाता है और खास अंदाज में मनाया जाता है। इसी फेहरिस्त में होली का भी नाम शामिल है। यहां होली के साथ ही रंगपंचमी पर भी रंगों की छटा देखने को मिलती है। शहर में होली को धूम-धाम से मनाने का अपना ही इतिहास रहा है। बात चाहे जमीदारों के समय की हो या होल्करों के समय होली को अलहदा अंदाज में ही मनाए जाने की परंपरा रही है।
एक समय इंदौर में होली से लेकर रंगपंचमी तक होली की धूम छाई रहती थी। इस दौरान अलग-अलग आयोजन भी किए जाते थे, जो होली के आनंद को दोगुना कर देते थे।
होल्करों के समय इंदौर में होली मनाने की शुरुआत देवघर में पूजा के बाद होती थी।
होल्कर परिवार के उदय सिंह राव होल्कर बताते हैं कि सबसे पहले महाराजा की देवघर में सवारी जाती थी। यहां गादी पर सोने की थाल में गुलाल, रंग और अन्य सामग्री रख अर्पित किया जाता था और चांदी की पिचकारी से होली खेली जाती थी। इस दौरान पांच बार तोपों से सलामी होती थी।
होली के पर्व में सरदारों, मनसबदारों और दीवानों को आमंत्रित किया जाता था। पुरूषों को चांदी के थाल में गुलाल, पान और सुपारी दी जाती थी।
वहीं, महिलाओं काे हल्दी और कुमकुम दिया जाता था। इस कार्यक्रम की जिम्मेदारी घरेलू विभाग के जिम्मे होती थी।
वहीं, इसके बाद लगने वाले दरबार में 21 राइफल्स की सलामी दी जाती थी। राजवाड़ा के आस-पास होली की चहल-पहल होती थी।
वही, दो बार महाराज होली देखने भी आते थे। इसके साथ ही राजवाड़ा और शिवविलास पैलेस के बीच आट्या-पाट्या खेेल भी खिलाया जाता था।
इतिहासकार जफर अंसारी के मुताबिक इंदौर रियासत में होली पर्व रंगपंचमी तक चलता था। इन दोनों के पर्वों के बीच युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों के सम्मान में वीर परंपरा का निर्वहन किया जाता था।
इस दौरान सैनिक परिवारों को होलकर खजाने की ओर से चांदी की चंवर, ढालें और तलवारों दी जाती थी।
इसके साथ जुलूस के रूप में मारूति मंदिर तक जाया जाता था और वहां से लौटने के बाद राजवाड़ा पर उन्हें खीर और सेंवईयां खिलाई जाती थी।
बता दे कि 300 वर्ष पूर्व जमीदारों के समय भी इंदौर में होली मनाने का अलग ही स्वरूप था। जमीदार परिवार की माधवी मंडलोई जमीदार ने बताया कि होली पर सूखे रंग से अधिक खेली जाती थी और पानी का उपयोग कम होता था।
इस दौरान होली मिलन समारोह का आयोजन होता था, जिसमें आस-पास के गांवों के लोग बड़ा रावला आते थे। इस दौरान चांदी की पिचकारी से भी होली खेली जाती थी। रंगपंचमी पर भी होली का आयोजन होता था, इस दौरान सूखे रंगों का कम और पानी का ज्यादा उपयोग किया जाता था।

 

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