सीधी। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए प्रदेश सरकार द्वारा 1 जनवरी 2024 से साइबर तहसील के माध्यम से नामांतरण कराने का दावा किया गया था, लेकिन सरकार का दावा खोखला साबित हो रहा है। दरअसल सरकार की कैबिनेट ने एक आदेश पारित किया, जिसके अंतर्गत रजिस्ट्री कराने के साथ ही अपने आप नामांतण किए जाने का दावा किया गया था। रजिस्ट्री कराने के 15 दिन के अंदर ही अपने आप नामांतरण आदेश ऑनलाइन देखने को मिल जाता और लोगों को तहसील के चक्कर नहीं लगाने पड़ते। इससे धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार पर चोट पहुँचाने की एक पहल की गई थी।
प्रदेश सरकार की इस पहल की भी प्रशासनिक अधिकारियों ने हवा निकाल दी और 5 माह बीतने के बाद भी यह प्रक्रिया अभी अँधेरे में है।
प्रदेशभर में साइबर तहसील बनाने का दावा किया गया था, जिसके माध्यम से पूर्णतः कंप्यूटर से स्वचलित प्रक्रिया के तहत नामांतरण प्रक्रिया को पूरा किया जाना था। इस प्रक्रिया से किसानों को भी लाभ मिलना था। रजिस्ट्री कराने के बाद इस पूरी प्रक्रिया में 15 दिन का समय निर्धारित किया गया था और संबंधित व्यक्ति को उसके फोन नंबर पर एसएमएस, वाट्सएप और ईमेल के माध्यम से अंतिम आदेश की सत्यापित प्रति उपलब्ध कराई जानी थी, लेकिन प्रदेश सरकार की मंशा पर पानी फिर गया।
साइबर तहसील की परियोजना 6 साल पहले भी शुरू हुई थी, जिसके अंतर्गत प्रदेश के 12 जिलों इंदौर, सागर, डिंडोरी, हरदा, ग्वालियर, आगर- मालवा, श्योपुर, बैतूल, विदिशा, दतिया, सीहोर और उमरिया में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर काम किया जा रहा था। यह प्रक्रिया अभी भी ट्रायल में ही है, क्योंकि प्रदेश भर में इस प्रोजेक्ट को लागू किए जाने के बाद भी तहसीलों में काम नहीं हो रहे हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक संपदा-2 नामक सॉफ्टवेयर अभी तक लागू नहीं हो पाया है। अभी ट्रायल में चल रहा है, लेकिन ऑनलाइन रजिस्ट्री तहसील कार्यालय से पहुँच रही हैं। तहसील कार्यालय में क्या व्यवस्था है, इस बारे में भी जिम्मेदार अधिकारी कुछ बोलने बताने के लिए तैयार नहीं हैं।
बता दे कि रजिस्ट्री कराने के बाद आसीएसएस सॉफ्टवेयर के माध्यम से तहसीलों में प्रकरण जाने के बाद उन प्रकरणों की सुनवाई से संबंधित निराकरण करने संबंधी प्रक्रिया ऑनलाइन नहीं की गई है।
किसी भी खसरे में यदि एक एकड़ जमीन दर्ज है और उसका विक्रय आधे एकड़ का हुआ है। ऐसे प्रकरण में बिना पटवारी प्रतिवेदन और आवेदक व अनावेदक को बुलाए निराकरण करने का प्रावधान नहीं रखा गया है।
पंजीयक विभाग में अभी भी संपदा- 1 नामक सॉफ्टवेयर काम कर रहा है, जिसमें गवाह की जरूरत पड़ती है। जबकि पंजीयक विभाग ने नया सॉफ्टवेयर संपदा 2 बनवाया है, जिसे अभी तक लागू नहीं किया गया है। इस कारण भी नामांतरण प्रकरण में परेशानी हो रही है।


