जबलपुर। आचार्यश्री समयसागर महाराज ने आचार्यश्री विद्यासागर समा भवन में अपने प्रवचन के माध्यम से कहा कि कर्म सिध्दांत के अनुसार प्रत्येक जीव अपने परिणामों के द्वारा मोह, राग, द्वेष में रूपी माव करके प्रति क्षण कर्मों का एकत्रीकरण करता है, उसके फलस्वरुप जीव को इसी जन्म में सुख, दुख मोगना पडता है। शक्ति की अपेक्षा से कर्म में विशेषता आती है। एक छोटा सा बालक है वह भी कर्म किए जा रहा है, उसमें सरलता देखने को मिलती है, वह नादान है, कुछ मी नहीं जानता। इसलिए उस शिशू की उपमा श्रमण से की जाती है। श्रमण की वृत्ति भी उस शिशु के समान होती, सरल होती है, श्रमण के हृदय में सरलता नहीं हो तो बहुत कठिन हो जायेगा।
आचार्यश्री समयसागर महाराज ने आगे कहा कि मोक्ष मार्ग जटिल तो है पर कुटिल नहीं, मोक्ष मार्ग में यदि कुटिलताई आयेगी तो वह मोक्ष मार्ग से बहुत दूर चला जायेगा। आर्जव धर्म की उपासना करने वाला भी वास्तव में श्रमण माना जाता है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में आचार्यश्री विद्यासागर महाराज के तैलचित्र के समक्ष कैलाश चंद जैन, राजेश किराना एवं संरक्षिणी समा के चक्रेश मोदी, नीरज, जितेन्द्र एर्वआनंद सिंघई ने दीप प्रज्जवलित किया।
सागर से पधारे मुनिश्री क्षमासागर के गृहस्थ जीवन के भाई अरुण जैन आचार्यश्री को श्रीफल भेंट किया। पाद प्रक्षालन का सौभाग्य बाबूलाल ऊनवाला परिवार के आशीष, अमित, अतुल को मिला।
कार्यक्रम का संचालन अमित पड़रिया ने किया।

