स्कूलों के लिए कानून तो बना, लेकिन नियमों में बचने के रास्ते भी छोड़ दिए

सिंगरौली। राज्य सरकार ने निजी स्कूलों की तरफ से लिए जाने वाले शुल्क में मनमानी से बचाने नियम तो बना दिए, लेकिन स्कूल संचालकों को बचाने के लिए गली के रास्ते भी बना दिए।
कहने को स्कूल रेग्यूलेशन एक्ट बनाया, लेकिन जिले में पांच साल में एक बार भी इसका असर नहीं हुआ। ऐसे साल दर साल स्कूलों में मनमाने तरीके से शुल्क तो बढ़ता गया, पालक की जेब कटती गई, लेकिन जिले के अधिकारियों की मोटी चमड़ी पर पालकों के विरोध का भी कभी कोई असर नहीं। अभी परीक्षाएं नहीं हुई है, लेकिन निजी स्कूलों ने नए प्रवेश को लेकर योजना बनाना शुरू कर दिया।
जिले में निजी स्कूलों में नर्सरी, केजी और पहली कक्षा में दाखिले की प्रक्रिया तो होती है, लेकिन इन स्कूलों की फीस क्या व कितनी होगी, इस बारे में कभी कोई नियम नहीं बना। जबकि फीस रेगुलेशन एक्ट के तहत स्कूलों की फीस तीस साल के लेखा-जोखा के आधार पर तय करने का नियम है।
स्थिति यह है कि पांच साल पहले कानून में एक बार भी जिला शिक्षा अधिकारी की ओर से स्कूलों से फीस तय कराने के लिए आवेदन तक नहीं लिए गए। न ही उनसे फीस के संबंध में कोई जानकारी मांगी गई है। ऐसे में फीस रेगुलेशन एक्ट जिले में मजाक बनकर रह गया है।
स्कूल फीस कमेटी के लिए शासन ने कलेक्टर को अध्यक्ष एवं जिला शिक्षा अधिकारी को सचिव नियुक्त किया है।
एक लेखा जोखा सदस्य एवं कलेक्टर की ओर से एक अन्य सदस्य की नियुक्त कमेटी में की है।
पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2008 में निजी स्कूलों की शुल्क और अन्य मनमानी पर लगाम कसने कानून बनाया। हाईकोर्ट के आदेश के बाद 2020 में इसके नियम बनाए, लेकिन इसमें जिला शिक्षा अधिकारी या अन्य किस अधिकारी को स्कूलों में जाकर बैलेंस शीट चेक करने या उसने किसी भी तरह की पूछताछ का अधिकार नहीं दिया।
राज्य सरकार के पूर्व कार्यकाल में जब ये बात सामने आई तो नियम में बदलाव करने की बात की, लेकिन हकीकत में ऐसा हुआ ही नहीं।
कानून बनाने के बाद भी निजी स्कूलों की मनमानी जारी है। निजी स्कूल हर साल एक से दो हजार रुपए तक शुल्क बढ़ा रहे हैं। पिछले साल भी स्कूलों ने कक्षा एक से 12 वीं तक शुल्क 700 से 2100 रुपए तक बढ़ा दिया। जबकि नियम अनुसार नए शिक्षण सत्र में प्रस्तावित शुल्क स्ट्रक्चर क्या होगा इसके लिए स्कूलों की बैलेंस शीट चेक कर तीन साल के लेखा-जोखा के आधार पर फीस तय की जाना चाहिए थी।

 

Next Post

उच्च न्यायालय व प्रशासन के आदेश के बाद भी कई सरकारी कार्यालयों में नहीं लगाए गए सीसीटीवी कैमरे

सीधी। जिले भर में कई सरकारी कार्यालय है, जहां पर अभी तक सीसीटीवी कैमरे नहीं लग सके है। ऐसे में यहां पर कर्मचारियों और आने वाले वालों पर निगरानी नहीं हो पा रही हैं। इसके साथ ही सुरक्षा के लिए मात्र चौकीदार की मौजूद रहता है। बीते वर्षों में उच्च […]