जबलपुर। आचार्य श्री समयसागर महाराज ने आचार्य श्री विद्यासागर सभा भवन में आयोजित धर्मसभा में अपने मांगलिक प्रवचन में कहा कि कर्म रूपी शत्रु को जिन्होने जीत लिया है, वह जिन है और जो जिन का अनुयायी है वह जैन है। जिन वे हैं जिन्होंने अपने मोह, राग, द्वेष रूपी शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है। जैन धर्म “अहिंसा परमोधर्मः” की बात करता है। अहिंसा की बात करने वाले बहुत से विद्वान मिल सकते हैं। लेकिन, अहिंसा बहुत सूक्ष्म तत्व है। इसका व्याख्यान बहुत बड़ा है।
अहिंसा चर्चा के साथ चर्या में भी होना चाहिए। दो प्रकार का संयम है इन्द्रिय संयम और प्राणी संयम, इन दोनों संयमों के द्वारा हम अहिंसा धर्म का पालन कर सकते हैं। अपनी पांचों इन्द्रियों और मन को वश में करना इन्द्रिय संयम है, हमें के जीवों की हिंसा नहीं करना प्राणी संयम है। जैन धर्म में संयम का बहुत महत्व है, हम अनादि काल से इन्द्रियों के विषय भोगो में लगे हैं, इनको छोड़कर संयम का पालन करके ही हम मोक्ष सुख प्राप्त कर सकते हैं।
धर्मसभा के प्रारंभ में मंगलाचरण का पाठ अमीषी ने किया।
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के तैल चित्र के समक्ष एनसी जैन(दिल्ली), सुभाष जैन(सीईओ), वीरू छावड़ा (बेंगलोर), सुनील अजमेरा (हजारीबाग), राजेश जैन (सीए) ने दीप प्रज्जवलित किया।
प्रतिभा मंडल की दीदीओं द्वारा आचार्य श्री को शास्त्र भेंट किया तथा आचार्य श्री के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य सिद्धांत, सुरभ्य (विनीत टाकीज) को प्राप्त हुआ।
संरक्षणी सभा द्वारा मनोज सोमपुरा एवं देवेन्द्र सोमपुरा को सम्मानित किया गया। इस दौरान बाल-ब्रह्म प्रीती दीदी ने भी उद्बोधन दिया।
संस्कारधानी की धरती पर आत्म निर्भरता, स्वदेशी वस्त्रों के लिए आचार्य श्री विद्यासागर महाराज की प्रेरणा से तिलवाराघाट में स्थापित हेन्डलूम में निर्मित वस्त्रों की संस्था ‘चल चरखा’ के आचार्य श्री विद्यासागर सभा भवान के समीप नये विक्रय केन्द्र का प्रातःकाल आचार्य श्री समयसागर महाराज ने ससंघ अवलोकन किया।

