इंदौर। मप्र उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शाजापुर कलेक्टर ऋजु बाफना द्वारा जारी उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें बिना विभागीय जांच के एक कर्मचारी की वेतनवृद्धि रोक दी गई थी।
न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई ने सुनवाई करते हुए कलेक्टर से 15 दिन के भीतर व्यक्तिगत हलफनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं।
बता दे कि शाजापुर निवासी जयंत बघेरवाल, जो राजस्व विभाग में सहायक ग्रेड-3 के पद पर 30 वर्षों से अधिक समय से सेवाएं दे रहे हैं। उन्होंने अधिवक्ता यश नागर के माध्यम से याचिका दायर की।
याचिका में कलेक्टर के 27 और 28 फरवरी 2025 के आदेशों के साथ ही संभागायुक्त के 11 दिसंबर 2025 के अपीलीय आदेश को चुनौती दी गई।
हाईकोर्ट ने इन तीनों आदेशों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की कि कलेक्टर ने बिना विवेक के अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करते हुए दंड दिया।
वही, कोर्ट यह भी कहा कि अपीलीय प्राधिकारी ने भी इस गंभीर त्रुटि को नजरअंदाज किया।
जानकारी के मुताबिक दिसंबर 2024 में ठेकेदार शाहिद खान ने बघेरवाल पर रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। इससे पहले बघेरवाल ने इसी ठेकेदार के खिलाफ एफआईआर की सिफारिश की थी और 85,000 रुपये की वसूली की कार्रवाई शुरू कराई थी।
शिकायत के बाद कलेक्टर ने नियम 14 के तहत आरोप-पत्र जारी किए बिना केवल कारण बताओ नोटिस जारी किया।
जांच अधिकारी की रिपोर्ट में 35,000 और 15,000 रुपये की रिश्वत के आरोप सिद्ध नहीं पाए गए, इसके बावजूद 27 फरवरी 2025 को ‘संचयी प्रभाव के साथ दो वेतनवृद्धियां रोकने’ की सजा दे दी गई, जो कानूनी रूप से बड़ी सजा मानी जाती है।
वही, अगले ही दिन 28 फरवरी को बघेरवाल को गुलाना एसडीओ कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया।
आरटीआई में यह भी सामने आया कि शिकायत में जिन वीडियो रिकॉर्डिंग का उल्लेख था, वे आधिकारिक रिकॉर्ड में मौजूद ही नहीं थीं। इसके अलावा, 30 साल की सेवा पूरी होने पर 18 दिसंबर 2025 को जारी तृतीय समयमान वेतन आदेश में भी उनका नाम शामिल नहीं किया गया, जबकि जूनियर कर्मचारियों को इसका लाभ दिया गया।
गौरतलब है कि 16 मार्च 2026 को भी हाईकोर्ट ने जिला आबकारी अधिकारी विनय रंगशाही के निलंबन को गलत ठहराते हुए कलेक्टर के आदेश को अनुचित माना था और उन्हें बहाल करने के निर्देश दिए थे।


